
हमने कहा,,
लिखने के लिये बार बार मरना पड़ता है
तन्हाई का एतबार करना पड़ता है
भावनाओं के समंदर मे डूबना उतरना पड़ता है
तब मेरे दोस्त कलम का साथ मिलता है
लिखते क्या अपने अहसास उतारते है कागचों पर
तन्हाईयों को ही साझा करते है कागचों पर
कहने सुनने समझने को जमाने अब कोई नही है
कलम को ही साथी बना एक जिन्दगी जी लिया करते है इन कागचों पर
गिले शिकवा किससे करूँ शब्दों से ही खेलता हूँ
कल्पनाओं मे ही सही अपने मे ही बतिया लिया करते है
रन्ज़ों गम की दूनियाँ मे पल पल ही इम्तिहान है
इम्तिहान भी दोस्तों दे लिया करते है इन कागचों पर
कलम है चला लिया करते है इन कागचों पर,,,,
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र











