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दो साल हो गए, पिताजी…

दो साल हो गए, पिताजी,
हमें अकेला छोड़कर गए हुए,
पर सच तो यह है कि उस दिन,
हम भी पहले जैसे अब न रहे।

जिस दिन आपकी आँखें मुंदी थीं,
हमारी दुनिया भी थम सी गई थी,
घर भरा था अपनों से लेकिन फिर,
एक गहरी खाली जगह बन गई थी।

आज भी दरवाज़े की हर आहट पर
दिल धड़ककर ये हमेशा सोचता है,
शायद आप जरूर आए होंगे लेकिन,
फिर याद आता है, आप तो बहुत दूर जा चुके हैं।

आपकी चप्पलों की वह आवाज़,
आपका धीरे से नाम और पुकारना,
मेरे सिर पर हाथ फेरकर और बिन बोले,
चुपचाप हौसला, दे जाना और साहस देना।

सब कुछ जैसे कल की बात हो,
पर छूने जाऊँ तो हवा मिलती है,
रोना चाहूँ तो आपकी ही सीख मिलती है,
आँसू पोंछने आ कर खड़ी होती है।

पिताजी, आपकी कमी शब्दों में नहीं समाती,
यह खालीपन भीतर तक चुभ जाता है,
भीड़ में भी जब मुस्कुराते हैं हम,
दिल चुपके से आपको ढूँढने लग जाता है।

दो साल बीत गए,
पर दुख का समय ठहरा हुआ है,
हर खुशी आधी लगती है अब हमें,
क्योंकि उसमें आपका हिस्सा अधूरा हुआ है।

कितनी बातें करनी थीं आपसे,
कितनी बार गले लगना था आपसे,
एक बार बस “सब ठीक हो जाएगा”
आपके मुँह से बस यही तो सुनना था।

जहाँ भी हों पिताजी,
बस इतना जान लीजिए,
आपकी याद में हम हर दिन,
थोड़ा टूटते हैं, थोड़ा सँभलते हैं।

आप गए नहीं…
आप हमारी रगों में बहते हैं,
हमारी हर प्रार्थना में रहते है आप,
हमारी हर धड़कन में रहते हैं आप।

दो साल हो गए…
पर आपके बिना हर दिन
आज भी पहला ही दिन लगता है।

रूपेश कुमार
चैनपुर, सीवान, बिहार

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