
तीर्थ, तीर्थ न रहे बन गए मौज-मस्ती पर्यटन स्थल।
चाह थी कभी गृहस्थाश्रम हू मुक्त, चल तीर्थ चल।
अनादि शक्ति का हो स्मरण जीवन के अंतिम पल।
कुछ पैदल वृद्ध बस-यात्रा में थे भजन, मन निश्चल।
जंगल कट चले पर्वतों का बडे पैमाने पे अब क्षरण।
भक्ष्याभ्क्ष सामान संग, लगे रहें बस ! वे उदर भरण।
धर्म से कुछ लेना-देना नहीं,गाड़ी में ले बोतल-गरल।
हंसी-ठिठोली कर चलें,मन रमे खुशी,झूमें पल-पल।
युवाओं की भरमार मिले,वहां पहुंचे रहे दल-बल।
सडकें रहे जाम, आश्रम में होटल सी दिखे हलचल।
गर्मी वहां अच्छी कटे,मोबाइल घंटी बजे पल-पल।
पैसे की गर्मी निकले, आनन्द डूबे मिलें धर्मस्थल।
सरकारें भी चाहें खूब उद्योग पनपे कुरेद दिये पर्वत-
तीर्थ धर्मस्थल मौजमस्ती के बने अब पर्यटन स्थल।
प्रकृति- सौंदर्य कहां, बिखरे मिलें पालिथिन,बोतल।
कलियुग भया तीर्थयात्री कम हो हल्ला भरे हैं खल।
महेश शर्मा, करनाल













