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गांव की चौपाल 

नीम तले वो चबूतरा, वो शीतल सी छांव 

लगी होगी चौपाल , जहां सुबह-शाम ।

कभी गुड़गुड़ाते हुक्के, कभी पुरजोर ठहाके।

राजनीति, खेती, किसानी, और पुराने किस्से।

वो चबूतरा जहां सब बैठकर बातें करते 

एक- दूजे के सुख-दुख के किस्से सुनाते।

सहारा बनते सभी एक-दूसरे  का…. 

आपसी सहमति से ही कोई निर्णय सुनाते।

बांटती अनुभव बुजुर्गों के टोली 

नटखट से बचपन की अटखेलियां भी।

मिलकर वही सब उत्सव मनाते 

दीवाली,तीज, रंग -बिरंगी,सी होली।

दिखती नहीं अब गांव की चौपाल अपनी 

खड़ा नीम अब भी…. तके राह सूनी ।

तकता रहा,  पलायन गांव का वह… 

वापसी की उम्मीद में झर रही हरेक टहनी।

उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’

        देहरादून (उत्तराखंड)

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