
शहर की जगमगाहट हो या गाँव की शांत पगडंडी,
सपनों के आड़े अब आती नहीं कोई तंग पगडंडी।
खड़े हैं ये तैयार, कंधे पर नई ज़िम्मेदारी लिए,
आँखों में भविष्य के जुगनू और हाथों में चमकते दीये।
कृषि विभाग की मिट्टी हो या बी-फार्मा की लैब,
हर मुश्किल का हल निकालते, ये बच्चे बड़े गजब।
कोई एयर-पायलट बन अंबर की ऊँचाई नापता है,
तो कोई चंद्रयान पर तिरंगा लहराने की हिम्मत रखता है।
मिट्टी के वो कच्चे हुनर अब बाज़ारों की शान हैं,
मधुबनी साड़ी और काठ के खिलौने देश की पहचान हैं।
परंपरा को मिला आधुनिकता का नया एक रूप,
मोम के दीये नई शेप में, बिखेरते रात की चाँदनी ।
वो बेटियाँ जो कल तक केवल आँगन की रौनक थीं,
आज मिस इंडिया बनकर दुनिया की धड़कन जीती ।
चाहे फ़िल्म जगत की चकाचौंध हो या खेलों का मैदान,
गाँव-शहर के युवा लिख रहे, सफलता का नया आख्यान।
संघर्ष के हर मोड़ पर, ये अपनों के साथ खड़े हैं,
माँ की ममता के लिए, इनके संकल्प सबसे बड़े हैं।
पिता के पुराने तजुर्बे को, ये नई तकनीक सिखाते हैं,
पुरानी पीढ़ी के साथ मिलकर, ये नया भारत बनाते हैं।
ये सिर्फ सपने नहीं, ये संकल्पों की एक लहर है,
आज की इस पीढ़ी के हाथों में, एक नई सुनहरी सुबह है।
कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)













