
न इच्छा किसी उपहार की
न ही इच्छा अब किसी पुरस्कार की
मन में बस यही कामना
देश-धर्म के लिए बढे दिलों में प्यार के उद्गार
कुछ ऐसे हों कर्म
मिल कर करें सभी विचार
देश धर्म का कैसे हो उद्धार
चहुं दिस
असत्य को ले कर
नीचतापूर्ण स्वार्थ भाव पनप रहे
शैतानों का आज हो चला बोलबाला
वो ही दिनों दिन धमक रहे
जानबूझ कर धर्म को
सड़को पर आज उन्होंने धर्म उछाला
धर्मपरायण जन-जन के
लहु में आया उबाला
मन व्यथित होता ये देख कर
सदियों रही विदेशी आततायियों की ज्वाला
फिर भी अक्षुण्ण रही धर्म की माला
जिनका जीवन पापमय
मन जिन के नहीं धर्मपरायण
मन उनके घिरे हैं आसुरी हाला
मोन आज क्यों है जनमानस
संस्कृति और इस राष्ट्र से प्रेम करने वाला।
धर्म को ग्रस लेना चाहे आसुरी माया
जैसे पड़ गई हो
चन्द्र पर राहु की छाया
सत्व विहीन छाया ने
मनोबल जन-जन का है भरमाया
आज अपनो ने ही घेर लिया धर्म
नहीं सामने आज पराया ।
महेश शर्मा करनाल











