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सशक्त एक उड़ान भरूं मैं

बाधाओं की परवाह किए बिना..

सशक्त एक उड़ान भरूं मैं।

जब तक लक्ष्य न साध  लूं अपना…

रुकने का  नाम,  न, लूं मैं।

नहीं, असंभव जीवन में कुछ भी…

फिर,  हालातों  से क्यों डरूं मैं।

लगन और विश्वास के, पर लगाकर…

क्यों ना, आसमान की उड़ान भरूं मैं।

नहीं चलना,  दुनिया की होड़ में…

राह,  अपनी खुद बनाऊं मैं।

होकर संयमित, मर्यादा, में रहकर.. 

अपनी संस्कृति की, पहचान बनू मैं।

माता-पिता का, आशीष पाकर… 

खुद,  अपना अस्तित्व बनाऊं मैं।

आ सकूं, काम किसी के, खुशी खुशी..

 यह,  जिम्मेदारी  निभाऊं मैं ।

रह जाए, पीछे जीवन की हर सीमाएं..

चला के पग, बस आगे बढ़ते जाऊं मैं।

उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’

देहरादून  (उत्तराखंड)

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