
धोखे की जिन्दगी मे नींद भी अब धोखेबाज हो गयी
चेन सुकून की नींद तो छोड़ो अब तनाव की नींद भी काफुर हो गयी
घंटों के हिसाब से नींद रात मे इन सुखे नयनों से मिलने आती है
मिलने का जैसे समय खत्म का एलान कर जगाकर भाग जाती है
क्या गिला हम करें औरों से यहाँ तो खुद की नींद भी बेवफा है
पुरकशिश इस दोगली दूनियाँ मे जैसे सारी कायनात ही मुझसे खफा है
कौनसे ना जाने वो अदृश्य ख्वाब है आस मे जिसकी जिए हम चले जा रहे है
नाउम्मीदी से भरी इस दूनियाँ मे उम्मीदों की एक लम्बी फेहरिश्त घुमाये जा रहें है
समझना था गलत एक जहाँ मे बसेरा हमारा था
इन्सान क्या जहाँ खुदा को भी हमारा वजूद नागँवारा था
किस परछाई की आहट तले अच्छे की तलाश मे भटक रहे थे
खारे पानी मे स्वाद अपना ढूंढ़ रहे थे
रब का इन्साफ था या इन्साफ पर रब की सज़ा ना जान पाया
कैसे आये क्यों आये मकसद अनजान की दूनियाँ मे क्या खोया क्या पाया
अब एक पुरकशिश गहरी नींद की ही आस है
भटकते बियाबान जंगल मे खुद के वास्ते निगाहें करम की तलाश है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र











