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भीड़ में खोए चेहरे

आधुनिकता की चकाचौंध में 

आज भी भीड़ में खोए कुछ चेहरे, 

बस उम्मीद की लौ लिए निकलते हैं।

अंजुरी भर सपने  बस उनके, 

ज्यादा जिम्मेदारी लिए  फिरते हैं।

हां, जिम्मेदारी शाम के निवाले की 

बार-बार सीती फटे हुए उस मां के आंचल की।

कमी नहीं हुनर की उसमें, मां ने 

पेट काटकर उसको काबिल बनाया है।

चकाचौंध भरी इस दुनिया ने 

हमेशा ही हुनर उसका ठुकराया है।

हुनर पर लगा दाग गरीबी का 

हर किसी ने दुत्कारा है।

हिम्मत की कहां कमी थी उसमें, 

उसने हर बार खुद को संभाला है। 

भीड़ भरी इन सड़कों पर 

आज भी वह दम भरता है ।

शाम के निवाले की उम्मीद लिए, 

काम पर निकलता है।

उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’ 

                 देहरादून (उत्तराखंड)

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