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हुताशनि(होलिका दहन)


अराजकता बढीं थी धरा मे अपार
दानवों की बढी अत्याचारh
लोग त्राहि त्राहि मे थे
विष्णु को कर रहे थे पुकार
ऐसे वक्त मे उस दानव के घर मे
लिया एक बालक जन्म,भक्त प्रहलाद ने ।
आशा कि किरण जगी,जग मे
हरि का गुणगान आरंभ हुआ पग पग मे
ये देख उस दानव की हुए चिंता
खत्म करो इसे,लगा आग की चिता
दानव की बहन थी ,नाम होलिका
ले भक्त प्रह्लाद को,गोद मे आग मे बैठा
चादर एक थी उसीके पास ऐसी
जो आग मे नही जल सकती थी
हरि की माया कोंन समझ सका है
चादर उड भक्त प्रह्लाद पर आ टिका है
धू धू कर जल उठी आग की चिता
जल कर भस्म हो गयी,होलिका
वो दिन थे बडी ही शुभ दिन
फाल्गुन मास के थे ,पूर्मीगा के दिन
तत्पश्चात उस दानव का भी हुआ निराकरण
हरि ने नरसिंह का अवतार का लिया प्रण
अत्याचारी से मुक्त हुए सभी जन
हरि का किये सबो ने श्रद्दा से स्मरण
तब से, हरेक वर्ष उह होलिका दहन को
हुताशनि पर्व के रूप मे मनाते है,सबको
बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक
ये हुताशनि पर्व है,बड़ी धार्मिक

चुन्नू साहा पाकूड झारखण्ड

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