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ऐसा रंग चढ़े जो कभी न उतरे


होली का यह त्यौहार आप सभी के जीवन में खुशियां भर दे ऐसी ईश्वर से प्रार्थना है।
रंग चाहे कोई भी चढ़े लाल, नारंगी, पीला चाहे कितना ही पक्का क्यों न हो एक दिन तो उतर ही जाना है। हर साल होली आती है और आएगी तथा मनाई जाएगी। किंतु त्यौहारों का मर्म यदि नहीं जाना तो बस जलसा ही है, त्यौहार नहीं।
रंगों से होली खेलना हम सभी को भाता है कहीं भंग, कहीं गुझिया तो कहीं समोसे। पिचकारी की धार हो चाहे गुब्बारे की मार, कहते बड़े प्रेम से हैं “बुरा न मानो होली है”। आनंद और उत्साह का त्यौहार है- होली, न्याय का उत्सव है- होली। हम होली मनाते हैं क्योंकि इसी दिन होलिका ने प्रह्लाद भगत को जलाने के उद्देश्य से गोद में बिठाकर अग्नि स्नान किया था। जब भावना में ही खोट हो तो कोई आशीर्वाद या वरदान साथ नहीं दे पाते इसका उत्तम उदाहरण है होलिका दहन।
होली बड़े उल्लास के साथ मनाएं किंतु बाह्य तथा आंतरिक वातावरण दूषित न हो इस प्रकार यदि मनाई जाए तो पर्यावरण संतुलन के साथ ही बौद्धिक संतुलन भी रहेगा।
रंग तो प्रहलाद पर चढ़ा था – भक्ति रंग। ये एक ऐसा रंग है जो कायम रहता है कभी उतरता नहीं। और इस रंग का नशा भंग से भी गहरा है जिसे चढ़ गया वो तर गया। ऐसा ही कोई रंग हमारे जीवन की स्थिरता के लिए आवश्यक है। कोई भक्ति रंग से रंगा है तो कोई प्रेम रंग से। रंग तो दोनों ही पक्के हैं। एक बार जो लग गया छूटेगा नहीं।
रंग दो अपार श्याम, रंग ज्यों भरा गुलाब, चाहते सदैव कर्ण, नाद वो सुनाइए। होलिका जला भतार, इंद्रिय पुकार सार, दर्श एक बार ईश, रूह में समाइए।।

दीपिका मानवानी,
गुजरात

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