
फागुन आया गली-गली में, लेकर रंग गुलाल,
हँसी बिखेरी हर आँगन में, छाया हर्ष विशाल।
ढोल मंजीरे धुन सुनाते, बजती मधुर तान,
रंगों की बरखा में भीगा, सारा हिंदुस्तान।
लाल रंग है प्रेम प्रतीक, हरा भरोसेदार,
पीला जैसे ज्ञान की आभा, नीला शांति अपार।
मीत गले मिल हर्ष जताते, भूलें सारे भेद,
रंग लगाकर मिटा रहे हैं, मन के सब संशय-छेद।
अबीर उड़े जब नभ की ओर, जैसे उड़ते स्वप्न,
मन की सूनी डाली पर भी, खिल उठते हैं सपन।
गुझिया की मधुर सुगंध से, महके घर-परिवार,
ममता की मृदु छाया में, खिलता प्रेम अपार।
बैर-भाव सब दूर भगाओ, गाओ मिलकर गान,
होली का यह पावन अवसर, दे नव जीवन-प्राण।
रंग न केवल तन को छूएँ, मन भी जाएँ रँग,
प्रेम-प्रकाश जले हर दिल में, मिटे अँधेरा संग।
ऐसी हो यह होली प्यारी, भर दे सुख के बोल,
रंगों में बस जाए जग सारा, हर्षित हो हर डोल।
कौशल










