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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

मत हिला तू उस महिला को ,
हिलाते हिलाते तू हिल जाएगा ।
दृढ़ पग को तू हिला न सकेगा ,
स्वयं ही ख़ाक में मिल जायेगा ।।
देख लिया है अब रमा बनकर ,
रावण बालि सदा ही मिला है ।
महिला बनी जब काली चंडी ,
अधमों का ही संहार खिला है ।।
द्रौपदी बनी तो देखा दुर्योधन
नारी निज चीर हरण कराई है ।
पाॅंचो पति भी नाकाम हुए थे ,
नारी तबसे देख बौखलाई है ।।
महा इला से महिला बनी है ,
इला पृथ्वी गाय सरस्वती है ।
जिसने किया नारी अपमानित ,
उसकी मारी जाती मति है ।।
नर होता नारायण जहाॅं पर ,
नारी विराजित नारायणी है ।
चुक जाए नर कर्म में भले ही ,
नारी ही कर्तव्यपरायणी है ।।

अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार

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