
हर ऑंधियाॅं चली गईं ,
मन की जो पली भईं ,
गई तन की चंचलता ,
जैसे जिंदगी छली गई ।
चली गईं मन ऑंधियाॅं ,
चली गईं तन व्याधियाॅं ,
तन मन निढाल खड़ा ,
भाग खड़ी विवादियाॅं ।
मन यह मदहोश पड़ा ,
तन हो ये बेहोश खड़ा ,
गया उन्माद था तन से ,
जैसे तन न जोश जरा ।
कैसे कहूॅं तन को मरा ,
तन को देख मन डरा ,
न तन मन में हरियाली ,
मूर्तिवत तन हो खड़ा ।
बाग बगीचे हैं हरे भरे ,
खग लोल किलोल करे ,
मनुज यह अर्द्ध्मूर्च्छित ,
क्यों न हिल डोल करे ।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।











