
कतरा-कतरा कर वो रीस रहा था,
अंदर ही अंदर खुद को घिस रहा था।
जैसे जर्जर दीवारों को नमी खा जाती है,
वो अपनी ख़ामोशी को हर पल पी रहा था।
ऊपरी रंगों से ये सीलन कभी नहीं जाती,
झूठी चमक से मन की घुटन नहीं जाती।
सफेदी कितनी भी चढ़ा लो इन दरारों पर,
ईंटों की गहराई से पुरानी नमी नहीं जाती।
घिस-घिस कर इसे तुम छुड़ा न सकोगे,
बुनियाद की मायूसी को मिटा न सकोगे।
ये सीलन गवाह है उन दबे हुए आंसुओं की,
जिन्हें तुम झूठी हंसी से दबा न सकोगे।
कोशिशें तमाम कीं कि दीवारें साफ़ दिखें,
पर सीलन का स्वभाव है कि वो उभर आती है।
परत दर परत उतरता है मुखौटा इंसान का,
जब हकीकत वक्त की आंच पर तप जाती है।
जो जड़ में समाया है, उसे बाहर क्या ढूंढना,
टूटे हुए शीशे में भला चेहरा क्या ढूंढना।
दिखावे की इस धूप से कुछ न होगा हासिल,
तपिश रूह की हो, तो ही ये नमी सुखा पाएगी।
सबके सामने मुकम्मल दिखना ज़रूरी नहीं,
कभी-कभी दरारों का होना भी फ़ितरत है।
परहेज कर इस बनावटी दुनिया से ऐ ‘रजनी’,
क्योंकि अंदर की सीलन ही तेरी असली हकीकत है।
रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश











