
कब हूं ना प्रीति कीजिए,
ये जग ना जाने प्रीति ।
तुम चलो सीधी चाल से
ये ओछी पाले प्रीति ।।
इनसे कब हूं ना उलझिए,
बेटा ,बनिता और आपनो यार,,।
इनकी कही को मानिए
ये देते सबको प्यार ।।
स्नेह तो कब हूं ना कीजिए
बस, छोड़ के पालनहार ।
बाकी मायावी जीव है
ये देते नहीं ,कभी किसी को प्यार। ।
मन तो देवे राम को
तज दुर्जन को व्यवहार ।
ये दुनिया सारी मतलबी
कब हूं ना चाले लार ।।
रंगा वस्त्र मन ना रंगा
निर्वस्त्र का क्या विचार ।
साधु तो उसको जानिए
जो रखे अंतर बाहिर एक व्यवहार ।।
अब तो धन की गर्मी चढ़ गई,
मन में बाढे विकार ।
साधु तो उसको जानिए
जो रहे सदा शुद्ध निर्विकार ।।
निष्ठुर यह संसार है
करे ना कोई विचार ।
तुम चलो सीधी चाल से,
ये उल्टी मारे मार ।।
राजेंद्र कुमार तिवारी मंदसौर ,मध्य प्रदेश













