
साँसों की यह बहती धारा, जीवन-मौत का संगम है,
गिन-गिन कर दीं साँसें उसने, उसका ही ये आलम है।।
वही समय तय करता सबका, कब आना कब जाना है,
जब गिनती पूरी हो जाए, वो पास हमें बुलाता है।।
कदम-कदम पर यहाँ चुनौती, पल-पल यहाँ संघर्ष है,
तप कर ही सोना बनता है, यही जीवन का उत्कर्ष है।।
काँटों वाली राहें होंगी, पावों में छाले भी होंगे,
पर जो लड़कर आगे बढ़ता, वही मंज़िल को पाता है।।
कभी मिली है मंज़िल हमको, कभी राह में भटके हैं,
कभी हँसे हम खुलकर तो, कभी अश्क भी टपके हैं।।
ये सुख-दुख के दो किनारे, जीवन की ही कहानी हैं,
उतरती-चढ़ती लहरों सी, ये अपनी जिंदगानी है।।
हम-आप तो बस इक ज़रिया हैं, इस जग के ताने-बाने में,
किरदार निभाते जाते हैं, इस आने और जाने में।।
कोई बड़ा है कोई छोटा, सब खेल उसी का होता है,
मिट्टी का है पुतला अपना, मिट्टी में मिल जाता है।।
कच्ची मिट्टी का ये बर्तन, फूट गया तो शोर ही क्या,
वक्त की चलती गर्दिश पर, भला किसी का ज़ोर ही क्या।।
तूफानों से टकराकर ही, कश्ती पार लगती है,
संघर्षों की भट्टी में ही, किस्मत अपनी जगती है।।
अभिमान की इस महफ़िल में, हम व्यर्थ ही शोर मचाते हैं,
खाली हाथ ही आए जग में, खाली हाथ ही जाएँगे।।
न गुमान रहे अपनी हस्ती का, न ही कोई अभिमान रहे,
हर श्वास का लेखा-जोखा ‘रजनी’, केवल वही निभाता है।।
रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश













