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अनकहा सिलसिला

चेहरे पर मुस्कान सजाकर,
राज़ छुपाना पड़ता है,
मन की बातें मन ही जाने,
खुद को बहलाना पड़ता है।

​आईने से आँख मिलाकर,
सच कहना आसान नहीं,
अक्स भी अपना अनजाना हो,
ये भी ज़माना पड़ता है।

​सन्नाटों की अपनी ज़ुबाँ है,
शोर में जो दब जाती है,
भीतर जो इक शोर मचा है,
उसे सुलाना पड़ता है।

​कितने सपने राख हुए और
कितनी यादें धुआँ हुईं,
इस बस्ती के सन्नाटे में,
दीया जलाना पड़ता है।

​पढ़ न सका कोई आज तक,
मन की कोरी चादर को,
हर पन्ने पर दर्द लिखा है,
जिसे मिटाना पड़ता है।

 रीना पटले, शिक्षिका 

शास हाई स्कूल ऐरमा कुरई
जिला सिवनी (मध्यप्रदेश)

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