
ये चुनाव जब भी आते हैं |
देकर लोभ लुभा जाते हैं ||
आए कभी न वर्षों से जो |
गले लगाकर सहलाते हैं ||
जन नेता बन जाते भिक्षुक |
चरण चूमते छलिया झुक-झुक ||
एक लक्ष्य बस सत्ता पाना |
परिणामों की मन में धुक-पुक ||
जामा पहने जन सेवक का |
अपना परचम फहराते हैं ||
ये चुनाव जब भी आते हैं |
जाति – धर्म की बातें करते |
वादों के आडंबर रचते ||
वोट खींचने करते साजिश |
दाँव-पेंच में माहिर लगते ||
ये कानून हाथ में लेकर |
प्रतिद्वंदी को धमकाते हैं ||
ये चुनाव जब भी आते हैं |
रंग – बिरंगे नारे रटते |
अपने स्वयं कसीदे गढ़ते ||
इनकी मोटी चमड़ी यारो |
लज्जा-शर्म ताक पर रखते ||
इनकी तिकड़म को पहचानो |
जाल वोट का फैलाते हैं ||
ये चुनाव जब भी आते हैं |
खूब बहाते नेता पैसा |
कोई चतुर न उनके जैसा ||
मत की कीमत पहचानो तुम |
करो न सौदा ऐसा वैसा ||
ध्यान रखें ‘संतोष’ हमेशा |
देश भक्त तब कहलाते हैं ||
ये चुनाव जब भी आते हैं |
संतोष नेमा “संतोष”













