
वृक्ष धरा के आभूषण हैं,
जीवन का आधार सखे!
रोपावनी कराकर करना,
पृथ्वी का श्रृंगार
धरती का करते पोषण हैं,
अमृत जल बरसा करके!
कोख कीयारी की भर जाती,
रिमझिम बूंदें पाकर के!!
देते जड़ जंगम चेतन को,
जीने का अधिकार सखे !
रोपावनी कराकर करना,
पृथ्वी का श्रृंगार सखे।।
कर्म बीज को सदा उगाते,
ज्ञान ध्यान के दाई हैं!
हो न सके यह धरा प्रदूषित,
करते सदा सफाई हैं !!
लोभ में पड़ इन्हें न काटें,
रक्षा का लो भार सखे !
रोपावनी कराकर करना,
पृथ्वी का श्रृंगार सखे !!
‘जिज्ञासु’ जन जीवन चाहे,
तो जल संचय करना है !
बिना वृक्ष के जन-गण-मन में
बस उपहास ही भरना है !!
क्षरण न होगा धरती का,
संग करें जब प्यार सखे !
वृक्ष धरा के आभूषण हैं,
जीवन का आधार सखे !!
कमलेश विष्णु सिंह ‘जिज्ञासु’













