
विधा: दोहा छंद गीत
हरियाली फैली हुई, हो चारों ही ओर।
मातु प्रकृति की गोद में, पाएगा सुख भोर।।
प्लास्टिक रोक समाज में, सेवें प्राणी मात्र।
वृक्षों को मत काटना, सभी सीखते छात्र।।
एक पेड़ का लक्ष्य जो, सभी जगह हो शोर।
मातु प्रकृति की गोद में, पाएगा सुख भोर।।
चट्टानों को छेड़ के, चला तेज रफ्तार।
होड़ लगा धरती बचा, पक्का निश्चय धार।।
नदियों को तू मोड़ के, खोएगा यूँ छोर।
मातु प्रकृति की गोद में, पाएगा सुख भोर।।
सासें ये वरदान हैं, सेवा को हृद धार।
भूमि-वायु की शुद्धता, करने हो तैयार।।
मर्यादा में नीर ले, शुचिता पे हो जोर।
मातु प्रकृति की गोद में, पाएगा सुख भोर।।
दीपिका किशोरी ‘चांँदनी’
गुजरात













