
राम नाम से ऐसी प्रीती हमको हो गई है।
अपने प्रियतम के प्रेम में जैसे ये दुनिया खो गई है।
प्रिय, प्रियतम और प्रियतमा सभी में राम ही दिखते हैं।
माता- पिता, सखा और भाई
सभी राममय दिखते हैं।
राम सजन में, राम भजन में,
दर्पण में राम ही दिखते हैं।
राम सांस में, राम आंस में,
सपनो में राम ही दिखते हैं।
राम नाम से ऐसी प्रीति हो गई,
बस एक नाम के आगे दुनिया फीकी हो गई।
राम को जप कर राम को पा लूँ।
लगता है जैसे त्रेता युग वासी हो गई।
राम नाम आधार इस युग में,
मै तो जैसे सतयुग में आ गई।
सियाराम जपते जपते अब तो,
हनुमत की कृपा को पा गई।
दुनिया पहुंची अंतरिक्ष में,
मैं घटघट वासी की हो गई।
घर लगता मंदीर सा मुझको,
प्रभु की आहट सी आ रही।
परिवार जन सब हुए राममय,
अब हर सांस राममय हो गई।
राम राम जपते जपते अब तो,
ये दुनिया राममय हो गई।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)












