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डूबती ममता का अमर आलिंगन

डूबती ममता का अमर आलिंगन
जब जीवन डूब रहा होगा,
उस मां ने अपने नन्हे को आगोश में समेटे
आख़िरी बार क्या सोचा होगा…
शायद ये कल्पना भी इंसान की समझ से परे है।
चारों ओर सन्नाटा रहा होगा,
प्रकृति भी जैसे स्तब्ध खड़ी रही होगी,
और बहती हुई जलधारा भी ठहरकर
उस ममता का आख़िरी संघर्ष देख रही होगी।
वो क्षण…
जब मृत्यु सामने खड़ी थी,
पर एक मां हार मानने को तैयार नहीं थी—
उसने अपने बच्चे को सीने से ऐसे चिपकाया होगा,
जैसे अपनी हर सांस, हर धड़कन
उसे सौंप देना चाहती हो।
डूबते हुए भी…
वो अपने नन्हे को बचाने की कोशिश करती रही होगी,
अपना अस्तित्व भुलाकर,
सिर्फ उसके जीवन के लिए लड़ती रही होगी।
लेकिन काल को दया नहीं आई—
न उस मां पर, न उस मासूम पर…
और जब सब कुछ शांत हो गया होगा,
तो शायद यम भी एक पल को ठहर गया होगा—
उसके भीतर भी एक पीड़ा उठी होगी,
“क्या मैंने एक जीवन नहीं,
ममता को ही समाप्त कर दिया?”
उस दिन शायद मृत्यु भी बोझिल हो गई होगी,
और यम अपने ही कर्मों से विचलित हो उठा होगा।
एक मां की ममता के सामने
स्वयं काल भी छोटा पड़ गया होगा।
लेकिन…
उस मां का अस्तित्व, उसका प्रेम,
उसका अंतिम आलिंगन—
समय के हृदय पर हमेशा के लिए अंकित हो गया।
और कहीं…
यम भी आज तक यह सोचकर मौन होगा—
कि उस दिन वह नहीं जीता,
बल्कि एक मां की ममता अमर हो गई…
और वह स्वयं कहीं न कहीं
कलंकित हो गया।

आर एस लॉस्टम
लखनऊ

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