
यह दृश्य नहीं, एक अमर कहानी है,
समय की छाती पर लिखी निशानी है,
जीवन-मृत्यु के बीच खड़ी होकर भी,
ममता की लिखी अपनी अंतिम वाणी है।
लहरों ने पूछा “क्या सब बह जाता है?”
माँ ने कहा “प्रेम कहाँ कभी मिट पाता है?”
चुप रहकर भी उसकी आँखें बोलीं,
“सच्चा स्नेह कभी नहीं खो जाता है।”
बंद पलकें, थके हुए से सपने,
पर बाँहों में आज भी जग अपने,
उसकी पकड़ में दुनिया सिमटी है,
टूटे पल भी अब लगते हैं सपने।
वो जान गई थी, तन हार जाएगा,
समय का चक्र सब कुछ खा जाएगा,
पर माँ की ममता को हारना नहीं आता,
वो आत्मा संग भी अमर हो जाएगा।
अजीब है ये संसार का अद्भुत मेला,
जहाँ खत्म होकर भी शुरू है खेला,
त्याग, समर्पण, प्रेम की अमर गाथा,
यहीं से उठता अमरता का अनंत प्रवाह।
लहरें उसे दूर ले जाना चाहें कितना भी,
पर उसकी बाँहें हमेशा ढाल बन जाएँ,
कहती रहें हर पल, हर साँस चुपचाप,
“मेरे रहते कोई आँच न आए तुझको।”
ये संघर्ष नहीं अब केवल जीवन का,
ये अर्थ है सबसे पावन अनोखा बंधन का,
जहाँ हर सीमा-रेखा, बंधन छोटी पड़ जाती,
माँ के ममता के आगे हर मोल है मन का।
ईश्वर हर जगह, हर पल नहीं हो सकता,
इसलिए माँ का ईश्वरीय रूप रचता है,
धरती पर प्रेम की सबसे गहरी ममता की,
छाया वही हमेशा बनकर बसता है।
वो शांत, सौम्य है फिर भी जिंदा है,
हर धड़कन में भी वो ध्वनित है,
जो प्रेम को जीना जानते हैं,
उनमें माँ सदा ही उपस्थित है।
माँ तो माँ है, यही तो सिर्फ सत्य रहा,
जल में डूबी, पर दीपक सा जला,
खुद डूबकर भी बचा लेती है माँ,
उसका अंश कभी नहीं डूबा।
रूपेश कुमार
चैनपुर, सीवान, बिहार











