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मौत की नुमाइश

हर तरफ़ अब दर्द की तस्वीर सजाई जा रही है,
मौत भी जैसे आजकल दिखलाई जा रही है।

जो कभी दिल में छुपाकर अश्क से सींची गई,
वो व्यथा अब सोशल मीडिया पर बताई जा रही है।

व्हाट्सएप के स्टेटसों पर शोक का बाजार है,
फेसबुक-इंस्टाग्राम पर पीर गिनवाई जा रही है।

क्या ज़रूरी है कि हर जनाज़ा सबको दिखाया जाए,
हर विदाई क्यों सरेआम सजाई जा रही है?

जो गया, उसकी भी गरिमा का कुछ तो मान हो,
क्यों अंतिम छवि भी जग में फैलायी जा रही है?

दर्द का रिश्ता तो होता है बहुत गहरा, निजी,
फिर उसे क्यों भीड़ में यूँ आजमाया जा रही है?

रोना दिल का काम है, ये शोर कैसा हर तरफ़,
संवेदनाएं भी यहाँ अब तो कमाई जा रही हैं।

मौन श्रद्धांजलि कहीं बेहतर थी शायद आज भी,
पर यहाँ हर भावना कीमत लगाई जा रही है।

मौत, स्मृति, सम्मान का विषय हुआ करती थी जो,
अब वही जैसे महज़ नुमाइश बनाई जा रही है।

सोचिए, क्या सच में ये श्रद्धा है या दिखावा मात्र,
क्योंकि अब इंसानियत भी दांव पर लगाई जा रही है।

आर एस लॉस्टम
लखनऊ

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