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नदियां

 बाल अवस्था स्वभाव से चंचल 

घर छोड़ने को उद्धत रहती।

छोड़ पिता का घर (हिमनद) 

जाने कौन दिशा को मचलती।

राह बड़ी दुर्गम थी उसकी 

ऊंची,नीची, विषम, पथरीली। 

सबको बहा ले चली संग अपने 

मानो सब हों संगी सहेली।

ध्येय रहा परोपकार सदा उसका 

सबके कष्ट  सदा ही हर लेती।

रक्त कोशिका से ये नदियां 

मानव मन की प्यास बुझाती।

दूध से बहती अविरल धारा 

प्रकृति मां के आंचल से।

करती यह मानव का पोषण 

सदा ही  निश्छल मन से।

उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’ 

               देहरादून (उत्तराखंड)

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