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अनुशासन की होती लकीर

सैनिक आगे आगे आकर करते हैं
देश रक्षा में हर रेशक्यू आपरेशन,
चाहे देश सीमा की रक्षा में तैनात हों,
या आंतरिक सुरक्षा कार्य में तैनात हों।

सेना का ट्रक धू धू कर जला आग से,
सैकड़ों लोग, कारें, बाइक और बसें,
कोई न रुका सैनिकों की मदद को,
सारे लोग गुजर रहे थे उसी सड़क से।

सैनिक मरने के लिये होता ही है,
यही तो कहा जाता है ज़्यादातर,
वह तो देश के रक्षा की ख़ातिर
कर देता है अपनी जान न्योछावर।

पर क्या कहता है नागरिक समाज
और सत्ता के भूखे बैठे राजनीतिक हैं,
सेना सेवा करके एहसान नहीं कोई
करते, सैनिक हर माह वेतन लेते हैं।

सैनिक की यही कहानी है बार बार,
वेतन, पेंशन भत्ते तक होते हैं फ्रीज़,
उनका हक़ तो कोई बात ही नहीं है,
आदित्य अनुशासन की होती लकीर।

डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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