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परिवार

घर सिर्फ ईंटों से नहीं बनता,
कुछ रिश्तों की गर्माहट भी चाहिए,
थके हुए मन को सुकून देने वाली
अपनों की आहट भी चाहिए।

परिवार वो छाँव है,
जहाँ धूप भी ठंडी लगती है,
जहाँ माँ की डाँट में दुआ,
और पापा की खामोशी में फिक्र दिखती है।

जहाँ भाई की शरारतों में अपनापन,
बहन की बातों में प्यार होता है,
जहाँ कोई कितना भी टूट जाए,
फिर भी कहता “मैं हूँ ना” वही परिवार होता है।

दुनिया चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो,
पर सुकून सिर्फ अपने घर में मिलता है,
हजारों चेहरों की भीड़ में भी
दिल अपनों के लिए ही धड़कता है।

परिवार वो रिश्ता है
जो खून से नहीं, एहसासों से चलता है,
जहाँ एक के आँसू गिरते हैं,
और दर्द पूरा घर सहता है।

जब जिंदगी थका देती है,
तब परिवार ही हिम्मत बन जाता है,
जो हर गिरते कदम को थामकर
फिर से मुस्कुराना सिखाता है।

इसलिए संभाल कर रखना
इन अनमोल रिश्तों को हमेशा,
क्योंकि धन तो फिर भी मिल जाता है,
पर एक सच्चा परिवार
किस्मत वालों को ही मिलता है… ।

नेहा कुमारी (शोधार्थी)
अखनूर, जम्मू कश्मीर

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