
गीत
फूल चमन में मुस्काते हैं।
भोर हुई जब मंदिर आए,
भक्ति वास मन को महकाए।
फिर भी अंतर के आँगन में
ये शांत नहीं हो पाते हैं।
फूल चमन में मुस्काते हैं।
गुरु वाणी ही समझाते हैं।
सत्संग ही ज्ञान सिखलाए,
जीवन -पथ उजियारा पाए।
फिर भी मन के मोहजाल से,
उबर नहीं ही हम पाते हैं।
फूल चमन में मुस्काते हैं।
माया जग भरमाते हैं,
लोभ-लालच मन भरमाए,
सत्य-पथ से दूर हटाए।
फिर भी प्रभु के चरणों में,
शांति के दीप जलाते हैं।
फूल चमन में मुस्काते हैं।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार












