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वट सावित्री व्रत

ज्येष्ठ अमावस आई, वट छाया सुखदाई,
सज-धज कर हर नारी, पूजा थाल सजाई।

फल-फूल धूप दीप, श्रद्धा से मन महकाया,
सावित्री के व्रत को, जीवन में अपनाया।

माथे सजे सिंदूर, चूड़ी खनके प्यारी,
अधरों पर मधु हास, छवि लगे मनोहरी।

आम्र पल्लव कलश, श्रीफल शोभा लाए,
भक्ति भाव से भरकर, सबने शीश नवाए।

कच्चे धागों से आज, वट वृक्ष बंध जाता,
आशा के हर सूत्र में, विश्वास झलक जाता।

परिक्रमा कर वृक्ष की, मन ही मन दोहराएँ,
दीर्घ सुहाग की कामना, श्रद्धा से सिर झुकाएँ।

सावित्री की कथा में, निष्ठा दीप जलता,
सत्यवान के जीवन संग, प्रेम अमर रहता।

यम से भी जो जीत गई, साहस की वह गाथा,
नारी शक्ति का सदा, गूँजता रहे यह नाता।

वट जैसे अडिग रहे, जड़ें धरा थामे हैं,
वैसे ही हर नारी, संबंधों को थामे है।

त्याग और तपस्या का, जीवन में विस्तार,
ममता की इस छाया में, बसता सारा संसार।

पर अब समय कहे कुछ, अर्थ नए समझाएँ,
नारी भी स्वयं को, पूजा में अपनाएँ।

संग-साथ जीवन का, दोनों मिलकर सँवारें,
समता के इस दीपक से, जग में उजियारे।

बरगदी अमावस अब, केवल रीत न होवे,
सम्मान और प्रेम का, हर घर में दीप जले।

वटवृक्ष साक्षी बन, आशीष सदा बरसाए,
सुख-शांति समृद्धि का, हर आँगन में गीत गाए।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर बिहार

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