
सत्य वान सावित्री व्रत कथा—
सरसी /कबीर छंद
लिखे विधाता भाग्य सदा ही, कर्म करें जो आप।
कुछ करनी कुछ करम गति, कुछ पूर्वज के श्राप।।
अश्वपति की सुता सावित्री, मिली उन्हें वरदान।
सावित्री के तप साधन में, रूप शील धनवान।।
हुई सयानी लाड़ लगाती, कनक देह थी ताप।
लिखें विधाता भाग सदा ही, कर्म करें जो आप।।
सत्य वान को पति चुनकर वो, चली पिया के संग।
अल्पायु कहे सत्यवान तो, छेड नारद प्रसंग।।
जीवन साथी वारा मैनें, करूं सदा ही जाप।
लिखे विधाता भाग सदा ही, कर्म करें जो आप।।
एक वर्ष पल भर में बीता, सावित्री बन त्राण।
लकड़ी काटे तड़फे गिरकर, निकल गये थे प्राण।।
यम ले जाते प्राण पिया के, अनहोनी को भाप।
लिखें विधाता भाग्य सदा ही, कर्म करें जो आप।।
चली गई वो पीछे-पीछे, सावित्री यमराज।
यम समझाये लौटो देवी, रचे विधाता काज।।
पति व्रत कहता धर्म यही तो, बनूँ पिया की चाप।
लिखे विधाता भाग्य सदा ही, कर्म करें जो आप।।
बुध्दि मती हो नारी सती तुम, माँगो कुछ वरदान।
नयन उजाला हो मातु- पिता, मिले उन्हें सम्मान।
सौ पुत्रों की लेकर ममता, ढोल बजे नित थाप।
लिखे विधाता भाग्य सदा ही, कर्म करें जो आप।।
पूरे करता हूँ मै सब कुछ, लौट सको तुम आज।
प्रतिबंधित है यमपुर जाना, सृष्टि का ये काज।।
पुत्र कहाँ से पाऊं भगवन, क्यों देते हो झाप।
लिखे विधाता भाग्य सदा ही, कर्म करें जो आप।।
हार गये यम सावित्री से, सावित्री की जीत।
अमर हो गई इस दुनिया में, पावन सुंदर प्रीत।।
वट सावित्री पूजन करके, कटे सभी संताप।
लिखे विधाता भाग्य सदा ही, कर्म करें जो आप।।
मौली बाँधे करे परिक्रमा, चना चिरौंजी भोग।
वट छैया बैठी सावित्री, बना तभी से जोग।।
सच्ची श्रद्धा मन से पूजन, कट जाते सब श्राप।
लिखे विधाता भाग्य सदा ही, कर्म करें जो आप।।
सिद्धेश्वरी सराफ शीलू
वट सावित्री अमावश्या सौभाग्य सिंदूर सभी मातृशक्तियों को हार्दिक शुभकामनाएं












