
प्रकाश पर्व
अँधेरे से लड़ता एक दीप नहीं,
ये सूरज है, चाँद है, तारों की भीड़ नहीं।
ये ज्ञान की किरण, विज्ञान की जीत।
हर मन के कोने में जलती एक प्रीत।
प्रयोगशाला में जली एक परखनली,
न्यूटन की आँखों में चमका सेब हरा।
आइंस्टीन की स्याही से जन्मा फ़ार्मूला,
तभी तो समझा जग ने प्रकाश का रहस्य बड़ा।
लेज़र से कटता अँधेरा बीमारी का,
फाइबर में दौड़ता संदेश प्यार का।
सोलर की छत पर जब सूरज उतर आए,
तो गाँव-गाँव में उजाला मुस्काए।
प्रकाश सिर्फ दिखता नहीं, दिखाता है राह,
भेद मिटाता रंग का, जात का, हर थाह।
कभी दीया बन मंदिर में जलता है,
कभी शिक्षा बन मन का तम हरता है।
आओ संकल्प लें इस प्रकाश दिवस पर,
हर बाल-मन में ज्ञान का दीप धरें।
नफरत की रात को हम यूँ विदा करें,
कि हर सुबह नई रोशनी लेकर उभरे।
क्योंकि प्रकाश सिर्फ किरण नहीं,
एक उम्मीद है, एक विश्वास है।
जहाँ प्रकाश है, वहाँ विकास है,
वहीं सच्चा मानव-आकाश है।
आदित्य अँधेरों को चुनौती दें,
घर – आँगन प्रकाश से भर दें।
16 मई अंतर्राष्ट्रीय प्रकाश
दिवस की हैं शुभकामनाएँ।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ












