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माननीय सेवक नहीं, शासक होते है

ताक़तवर होकर झुक कर रहना
भी व्यक्ति का श्रेष्ठ गुण होता है,
श्रेष्ठ होते हुये भी साधारण जैसा
व्यक्तित्व सर्वश्रेष्ठ गुण होता है।

वोट माँगने न आया कोई अब तक
कहते हैं शत प्रतिशत मतदान करो,
सोसल मीडिया में है गुणगान बहुत
कि सब शत प्रतिशत मतदान करो।

चुनाव में घर घर जा वोट माँगना,
व दोनों हाथ जोड़ विनती करना,
दुःख-दर्द जानना अपने वोटर का,
सम्मान किया जाता था जनता का।

अब तलक नेता के दर्शन नहीं हुये,
वादे निभाने के कोई वचन नहीं दिये,
जो वादे अब तक पहले किये गये,
वह भी कतिपय पूरे नहीं किये गये।

बस उस राजनीति के व्यूह रच गये,
जो अब तक भारत की रीति नहीं थी,
घर घर में, भाई भाई में वैमनस्य बढ़ा,
रिश्तों की बलि चढ़ी, अति रोष बढ़ा।

राजनीति में मर्यादा का हनन हो रहा,
पद, यश का अहंकार बोझ बढ़ रहा,
आदित्य ये बोझ ढोने वाले डूबते हैं,
माननीय सेवक नहीं, शासक होते हैं।

कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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