
मैं हूं तेरे प्रेम का प्यासा, तुम सागर सी गहराई हो
मेरे तो बस नैन नशीले, तुम बदन की गदराई हो
सागर की लहरें हो तुम, सरोवर की कमल भी हो तुम
मन को निर्मल कर देती है, वो सरिता सी विमल भी हो तुम
मैं हरदम तेरे धुन में रहता, तुम राग बहार की शहनाई हो
मैं हूं तेरे प्रेम का प्यासा, तुम सागर सी गहराई हो
बागों में जो फुल खिलें हैं, सब देखें सुंदरता तेरी
मैंने भी कह दिया है उनसे, मत देखो वो है बस मेरी
मैं हूं पतझड़ का सूनापन, तुम पावस की हरियाली हो
मैं हूं तेरे प्रेम का प्यासा, तुम सागर सी गहराई हो
जीवन के इस चित्रपट में, मैं हूं जिस्म तुम जान हो मेरी
मैं फकत हूं दास तुम्हारा, तुम हो गृहस्वामिनी मेरी
मैं तो हूं प्रवासी प्रियतम, तुम चौखट और अंगनाई हो
मैं हूं तेरे प्रेम का प्यासा, तुम सागर सी गहराई हो
फाल्गुन की वसंती बयार में, मैं जब देखूं मादकता तेरी
तेरी चंचलता से पल पल, बढ़ जाती मदहोशी मेरी
मेरा दिल गुलाब हो जाता, जब तुम लेती अंगड़ाई हो
मैं हूं तेरे प्रेम का प्यासा, तुम सागर सी गहराई हो
रवि भूषण वर्मा












