
मुखड़ा :
मेरे पहलू में नहीं, आप की मुठ्ठी में नहीं,
बे-ठिकाने हैं बहुत, दिल से ठिकाना दिल का।
ढूँढ़ता फिरता रहा, प्यार का साया हरदम,
है अजब राह ये, और है अफ़साना दिल का।।
राह में धूप मिली, छाँव भी छलती रही,
हर खुशी पास आई,दर्द में ढलती रही।
जिसे चाहा था कभी, वो ही बेगाना हुआ,
टूटकर भी ये मगर, साथ ही चलता रहा।
है अडिग जिद यही—प्यार निभाना दिल का,
बे-ठिकाने हैं बहुत, दिल से ठिकाना दिल का।।
सादगी ओढ़ के ये, जग को सजाता रहता,
दर्द पीकर भी सदा, मुस्कुराता रहता।
टूटे सपनों से भी, दीप जलाता है ये,
हर अँधेरे में नई, राह बनाता है ये।
चार चाँद तब लगे, जब हो दीवाना दिल का,
बे-ठिकाने हैं बहुत, दिल से ठिकाना दिल का।।
ख़्वाब पलकों पे लिए, रात गुज़ारी कितनी,
साँस चलती रही, फिर भी थी दूरी जितनी।
कोई समझा न यहाँ, मौन की भाषा इसकी,
हर किसी ने किया, बस इम्तिहान ही इसकी।
फिर भी मासूम सा, ढूँढ़े बहाना दिल का,
बे-ठिकाने हैं बहुत, दिल से ठिकाना दिल का।।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार












