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प्रवृत्तियाँ या विकार

मानव जीवन की समस्या है कि जिन
प्रवृत्तियों को हम विकार मान लेते हैं,
और निंदा करते हैं बे प्रवृत्तियाँ जीवन
जीने के लिए अत्यंत आवश्यक होतीं हैं।

संसार की गति और प्रगति इन्हीं
प्रवृत्तियों पर ही आधारित होती है,
‘काम’ से ही सृष्टि की रचना होती है,
इसके बिना सृष्टि निर्मित नहीं होती है।

लोभ व लालच से ही क़र्म व पुरुषार्थ
कर पाने के लिए प्रेरणा भी मिलती है,
क़र्म एवं पुरुषार्थ से समाज निर्माण व
आविश्कार की जिज्ञासा बढ़ती है।

आवेश व्याप्त होने पर अन्याय के
विरुद्ध न्याय की आवाज़ उठती है,
क्रोध की प्रवृत्ति अनुचित कार्यों के
विरुद्ध जाकर उनका विनाश करती है।

अक्सर हम गलती को सफलता
की पहली सीढ़ी भी मान लेते हैं,
परंतु वास्तव में गलती में सुधार ही
सफलता का प्रथम सोपान होता है।

हम संघर्ष में ग़लतियों से सीख लेते हैं,
और यही सीख हमारी ताक़त बनती हैं,
ग़लतियों की प्रवृत्ति भी मनोविकार ही हैं,
जो जीवन के विकास को आगे बढ़ाती हैं।

आदित्य जीवन का हर पल हर पहलू
हमें सीख देता है, जो बहुमूल्य होता है,
हम सीखों को समझते हैं या हम इनसे
मुँह मोड़ते हैं,यह हम पर निर्भर होता है।

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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