
जीवन के अनुभव से सीख मिली,
मेरी कमियों ने नापसंद करवाया,
उससे ज़्यादा नापसंद वो करते हैं,
मेरी खूबियों ने जिनको दूर किया।
पैर से काँटे निकलने के बाद जो
आनन्द पैदल चलने में आता है,
वही आनंद अहंकार बोझ ख़त्म
होने से मानव जीवन में आता है।
आरंभ तो किया रहस्य के साथ,
पर रहस्य अंत तक चलता रहा,
पर्त दर पर्त तब भी खुलती रही,
जो बचा वह है भावनाओं भरा।
धन्यवाद करता हूँ आप सबका,
सादर आभार भी अब आपका,
कविता रचना तो एक बहाना है,
भावाभिव्यक्ति व्यक्त करने का।
अनुभव और उद्ग़ार बहुमूल्य हैं,
इनकी अभिव्यक्ति का महत्व है,
शब्दों में व्यक्त या भाव भंगिमा से,
आदित्य अव्यक्त व्यक्त हो स्नेह से।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ












