
हिंदू कालगणना में हर तीसरे वर्ष एक ऐसा महीना आता है जो कलियुग में भी सतयुग का अनुभव करा देता है—वही है पुरुषोत्तम मास, जिसे मलमास या अधिक मास भी कहते हैं। यह कोई ‘अशुभ’ महीना नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण का स्वयं का मास है। कहते हैं, जब सभी महीनों को देवताओं में बाँट दिया गया, तो मलमास रोने लगा। तब श्रीकृष्ण ने उसे अपनी शरण दी और वरदान दिया—“जो फल बारह महीनों में न मिले, वह तुझे एक महीने में मिलेगा। तेरा नाम मेरे नाम पर पुरुषोत्तम मास होगा।” तभी से यह मास भक्ति और शक्ति दोनों का अक्षय स्रोत बन गया। पुरुषोत्तम मास का उदभव अधिमास के रूप में इस तरह से होता है। सूर्य वर्ष 365 दिन का, चंद्र वर्ष 354 दिन का। दोनों का 11 दिन का अंतर हर 32 माह 16 दिन में एक चंद्र मास बढ़ा देता है। वही अतिरिक्त मास ‘अधिक मास’ है। जिस मास में सूर्य संक्रांति नहीं पड़ती, वही मलमास कहलाता है। इसे ‘मल’ यानी मलिन समझकर विवाह, गृहप्रवेश जैसे शुभ कार्य वर्जित हैं। पर आध्यात्मिक कार्यों के लिए यह ‘पुरुषोत्तम’ यानी सर्वश्रेष्ठ है। भक्ति का स्रोत माना जाता है। भगवान का अपना मास कहा जाता है। पद्म पुराण कहता है—“द्वादशसु मासेषु यत्फलं न लभ्यते, तत्फलं लभते मर्त्यः पुरुषोत्तम सेवनात्।” यानी 12 महीनों में जो पुण्य न मिले, वह पुरुषोत्तम मास की सेवा से मिल जाता है।
छोटे छोटे कर्म से हमें बडे़ फल मिलते है। इस मास में किया गया एक दीपदान, एक माला जप, एक दिन का व्रत, एक कथा श्रवण—हज़ार गुना फल देता है। इसलिए भक्तजन पूरे महीने भागवत कथा, विष्णु सहस्रनाम, रामायण पाठ,दान-पुण्य में लीन रहते हैं। अहंकार का नाश होता है। मलमास में सांसारिक कार्य वर्जित हैं, ताकि मनुष्य बाहरी दौड़ से हटकर भीतर झाँके। सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठना, तुलसी-पूजन, तीर्थ-स्नान, मौन-व्रत—ये सब भक्ति को गहरा करते हैं। शक्ति का स्रोत संकल्प की शक्ति पूरे महीने अन्न त्याग, एक समय भोजन, नमक-त्याग जैसे नियम लेने से इच्छाशक्ति बढ़ती है। जो 30 दिन मन को काबू कर ले, वह सालभर इंद्रियों का राजा बन जाता है। इस मास में अन्नदान, वस्त्रदान, जलदान, गौ-दान का विशेष महत्व है। शास्त्र कहते हैं—“पुरुषोत्तमे मासि दानं सर्वस्व दानफलम्।” भूखे को भोजन देना, प्यासे को पानी पिलाना—यही असली शक्ति है जो समाज जोड़ती है। कर्म-शुद्धि की शक्ति मलमास को ‘मल’ धोने वाला मास मानते हैं। जाने-अनजाने हुए पाप, ग्रह-दोष, पितृ-दोष के निवारण के लिए यह सर्वोत्तम समय है। विष्णु पूजा, श्रीमद्भागवत श्रवण, दीपदान से प्रारब्ध भी हल्का होता है।
क्या करें पुरुषोत्तम मास में?- प्रातः स्नान-ध्यान-सूर्योदय से पहले उठकर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप। रोज शाम तुलसी के पास या मंदिर में घी का दीपक जलाएँ।भागवत, रामायण, गीता का एक अध्याय नित्य पढ़ें। अपनी सामर्थ्य अनुसार 33 चीजों का दान—अनाज, फल, बर्तन, दक्षिणा। 33 की संख्या 33 कोटि देवताओं का प्रतीक है। व्रत-नियम: एक समय सात्विक भोजन, ब्रह्मचर्य, सत्य बोलना, क्रोध न करना। आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता- आज की भागदौड़ में हम ‘टाइम’ तो निकालते हैं, पर ‘सेल्फ’ के लिए नहीं। पुरुषोत्तम मास साल में एक बार 30 दिन का ‘स्पिरिचुअल रिट्रीट’ देता है। मोबाइल-टीवी से दूर, मंत्र-दान-सेवा के पास। ये 30 दिन की कमाई अगले 3 साल तक ऊर्जा देती है। इसलिए मलमास को ‘फालतू महीना’ मत कहिए। यह भगवान का दिया बोनस महीना है। जो इसे भक्ति से भर देता है, उसे शक्ति अपने आप मिल जाती है। जैसा नाम—पुरुषोत्तम, वैसा काम—आत्मा को उत्तम पुरुष, यानी परमात्मा से जोड़ देना।
आइए, इस पुरुषोत्तम मास में हम भी संकल्प लें—तन से सेवा, मन से सुमिरन, धन से दान। तभी जीवन में सच्ची भक्ति और सच्ची शक्ति आएगी।।
मुन्ना राम मेघवाल ।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।












