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संगदिल ये दुनियाँ है

बड़ी ही संगदिल ये दुनियाँ है
कौन अपना कौन पराया
समझ एक जनम ना आया
दवा जिसने दी दर्द भी उसी से पाया
कि बडी ही संगदिल ये दुनियाँ है

बनके हमराह गर्त मे मशान का रास्ता दिखाया
गिरते को उठाने का फरेब भी क्या खूब दिखाया
रिश्ते नही रिश्तों का स्वांग भी बेखौफ रचाया
अपना नही कोई कि अपनापन जताते है
बड़ी ही संगदिल ये दुनियाँ है

जिंदगी हमारी मसीहा वो बन गये
संघर्ष हमारा था श्रेय वो ले गये
आज़ाद थे है वक्त गुलाम बन गये
क्या थे क्या हो गये जबान से गूंगे हम हो गये
क्यों बड़ी ही संगदिल ये दुनियाँ है

रिश्तों को ए दिल क्या खूब हमने निभाया
जिन्हें अपना माना पल लगे उन्हे करने मे हमे पराया
प्रेम था नही प्रेम का बहाना कर लेते
मरने तक ही प्रेम का एक अफसाना कर लेते
गले जिन्हें लगाया ठुकराया भी उन्ही ने
क्या कहें बड़ी ही संगदिल ये दुनियाँ है

अब कसम यकीं इंसान क्या साये से भी जाता रहा
अपने ही तन्हा मन को मनाता रहा
भरम एक अपनों का लेकर बस चलता रहा
जिंदगी को यूँ ही मुठ्ठीयों से फिसलता देखता रहा
वक्त का सितम था सहता रहा बस सहता रहा
अब कैसे कहें क्या कहें बड़ी ही संगदिल ये दुनियाँ है


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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