
दर बदर भटक रहा हूँ क्या करूं इस जीवन का।
कौन काटेगा रे कन्हैया ये चक्कर जन्म मरण का।।
लाख चौरासी भट रहा हूँ कोई उपाय बता दो निवारण का।
कौन काटेगा रे कन्हैया ये चक्कर जन्म मरण का।।
माटी का ये शरीर है कान्हा माटी में मिल जायेगा।
तेरे कृपा बिन रे कन्हा मुक्ति कहाँ मिल पायेगा।।
अपनी कृपा बरसा दो मुक्त कर दो जन्म मरण का।
कौन काटेगा रे कन्हैया ये चक्कर जन्म मरण का।।
बुलालो अपनी शरण में मुझकों रखलो रे कन्हैया।
लाख चौरासी भटक रहा हूँ बिनती सुन लो रे कन्हैया।।
न जाने क्या होगा रे कन्हैया तेरे बिना इस जीवन का।
कौन काटेगा रे कन्हैया ये चक्कर जन्म मरण का।।
तेरे शिवाय यहाँ पर रे कान्हा दया न कोई करने वाला है।
पल भर में जीवन मृत्यु है कोई न जाने क्या होने वाला है।।
इसी बात से डरता हर कोई क्या होगा इस जीवन का।
कौन काटेगा रे कन्हैया ये चक्कर जन्म मरण का।।
चन्दे पासवान उर्फ अलबेला जी मधुबनी बिहार












