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पुरुषोत्तम मास

मलमास कहे जग तिरस्कृत, मन में पीड़ा भारी,
स्वामी-विहीन व्यथा लिए वह पहुँचा शरण तुम्हारी।
भगवान विष्णु ने करुणा कर दी, लेकर गए सहारा,
श्रीकृष्ण ने दिया तब उसको अपना नाम उजियारा।

अब से तुम पुरुषोत्तम हो, जग में मान बढ़ेगा,
मेरे सम गुण-धाम तुम्हारा, यश अमर सदा रहेगा।
तीन वर्ष में आता यह, पुण्य-प्रभा बरसाता,
जप-तप, दान, उपासना से जीवन सुधा लुटाता।

श्रीमद्भगवद्गीता का गूढ़ पाठ,मन को शांति दिलाता,
राम-कथा, भागवत श्रवण, हरि भक्ति जगाता।
तुलसी अर्चन, दीपदान, फल अनंत दिलाते,
एक अन्न, एक समय से, पाप सभी मिट जाते।

शुभ-विवाह, मंगल कार्य, इस मास नहीं सुहाते,
किन्तु धर्म-कर्म के पथ पर, पुण्य-दीप जगाते।
एक रुपया दान यहाँ, सौ गुना फल देता,
भक्त हृदय में हरि-प्रेम का सागर उमड़ता रहता।

संक्रांति रहित यह मास, अलौकिक भाव जगाता,
वैराग्य-भक्ति के संग, जीवन पथ दिखलाता।
पुरुषोत्तम की महिमा यह, वेद-पुराण बताते,
जो श्रद्धा से साधे इसको, हरि-धाम को जाते।

जय-जय पुरुषोत्तम मास, कृपा बरसाओ न्यारी,
हर लो मन का अंधकार, कर दो जीवन प्यारी।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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