
नेता है कपट वाला, कहलाता टोपी वाला,
देश को कर रहा कंगाल,
खुद होता रहा मालोमाल।।
नेता है नीति बनाता, खुद को अनीति है भाता,
गरीबों का पेट काटकर, अपना ही घर है सजाता।
चेहरे पर मीठी मीठी चाल,
भीतर से हैं जैसे चांडाल।
वोट के मौसम में आकर, पैर है सभी के पड़ता,
जीत गया तो फिर जनता, से दूरी ही बस रखता।
जनता होती रही है बेहाल,
झूठे वादों का बिछा जाल।
हिन्दू-मुस्लिम में उलझाकर, नफ़रत की आग लगाता,
जाति-धर्म के नाम पे केवल, अपना ही स्वार्थ निभाता।
बिहार, यूपी हो या हो बंगाल,
हर तरफ मचा है ये बवाल।
कुर्सी की खातिर नेता, रिश्तों को भी है तोड़े,
जनसेवा की बातें करके, वादे सब कोरे कोरे।
जनता पुछ रही है सवाल,
कब सुधरेगा बुरा हाल।
वादे पर वादे करता, फिर उनको भूल ही जाता,
सच की आवाज दबाकर, झूठ का दरबार सजाता।
क्षण में बदलते अपनी चाल,
ओढ़ कपट की काली शाल।
बहन बेटियां नहीं सुरक्षित, शासन से तो हैं उपेक्षित,
कैसा कानून बना है, अपराधी है संरक्षित।
गधे ने ओढ़ रखी शेर की खाल,
फैला रखा कूटनीति का जंजाल।
रवि भूषण वर्मा












