
डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक ,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर,सामाजिक कार्यकर्ता है
जिंदगी में रिश्ते वो अचार हैं जो धूप में भी रखा जाए तो गलता है और छाँव में भी सड़ता है। तीखे हैं तो जीभ जलाते हैं, खट्टे हैं तो आँख से पानी लाते हैं, मीठे हैं तो चींटियाँ लग जाती हैं। कुरकुरे हैं तो दाँतों तले किरकिराते हैं, टेंगी हैं तो मन कसैला कर जाते हैं, क्रिस्पी हैं तो हाथ से फिसल जाते हैं। आओ आज इनकी कच्ची कलियों को मसलते है, पंखुड़ियाँ गिनते है, काँटे से खेलते है।
सामाजिक रिश्ता सबसे पहला ढोंग है। यहाँ बेटा तभी बेटा है जब बुढ़ापे की लाठी बने, बेटी तभी लक्ष्मी है जब दहेज कम लाए, बहू तभी अच्छी है जब चुप रहे, दामाद तभी देवता है जब जेब भरी हो। मुहल्ले की पंचायत तय करती है कि किसका दुख बड़ा है और किसकी इज्जत सस्ती है। रिश्ते यहाँ स्टेटस अपडेट की तरह हैं। लाइक घटे तो रिश्ता घटा। कमेंट न आए तो शक बढ़ा। शादी का कार्ड वाट्सएप पर आया तो समझो रिश्ता डिजिटल हो गया। तेहरवीं पर जीमने वालों की गिनती से तय होता है कि जाने वाला कितना सामाजिक था।
आर्थिक रिश्ता सबसे नंगा सच है। बाप की पेंशन पर बेटों के हिस्से होते हैं, माँ के गहनों पर बहुओं की नज़र होती है। भाई भाई तब तक है जब तक ज़मीन का बँटवारा न हो। दोस्ती तब तक है जब तक उधार वापसी की तारीख न आए। प्रेमिका का खर्च उठाना मौद्रिक रिश्ता है, प्रेमी का गिफ्ट देखना मौद्रिक रिश्ता है। नौकरी लगते ही रिश्तेदारों की भीड़ बढ़ती है, नौकरी जाते ही फोन साइलेंट पर लग जाते हैं। बाजार ने हर रिश्ते का एमआरपी तय कर दिया है। खून भी अब छूट पर बिकता है, बस बिल बनना चाहिए। रिश्ते यहाँ ईएमआई हैं। किस्त टूटी नहीं कि कुर्की आ गई।
वैदिक रिश्ता कहते हैं कि पत्नी अर्धांगिनी है, पर सच थोड़ा कसैला है, धरातल और व्यवहार में पाँव की जूती है। शास्त्र कहते हैं मातृदेवो भव, पर ओल्ड एज होम की लिस्ट लंबी है। यज्ञ में साथ बैठने वाली सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी। रिश्तों के सात वचन निभाने से पहले सात फेरों के फोटो इंस्टाग्राम पर चाहिए। मंत्रों से जोड़ा गया रिश्ता वकील के एक दस्तखत से टूट जाता है। वेद ने कहा वसुधैव कुटुम्बकम, हमने सोसाइटी में कुटुम्ब को ही ब्लॉक लिस्ट में डाल दिया।
लौकिक रिश्ता स्वार्थ की चाशनी में डूबा जलेबी है। सीधा दिखता है पर टेढ़ा है। पड़ोसी सुख में जलता है, दुख में पंच बनता है। रिश्तेदारी निभाने का मतलब है साल में एक बार शगुन का लिफाफा बदलना। नामकरण, मुंडन, शादी, तेरहवीं। रिश्ते कैलेंडर के खाने हैं। तारीख निकली, रिश्ता निपटा। मोहल्ले वाला चाचा तभी तक चाचा है जब तक उसकी छत पर तुम्हारी पतंग न गिरे।
परालौकिक और दैविक रिश्ते का डर दिखाकर भी दुकान चलती है। बाबा कहते हैं पिछले जन्म का लेन देन है, इसलिए सास बहू लड़ती है। ग्रह कहते हैं पत्नी सुख नहीं है, इसलिए दूसरी वाली देखो। कुंडली मिलान में 36 गुण मिले पर तलाक के बाद पता चला कि एक भी गुण इंसानियत का न था। भगवान को भोग लगाते हैं पर भूखे भाई को पानी नहीं पूछते। मंदिर में साथ जाते हैं पर मन में एक दूसरे के लिए ज़हर रखते हैं।
नैतिक रिश्ता किताबों में सोता है। सच बोलो तो रिश्ता टूटता है, झूठ बोलो तो रिश्ता टिकता है। ईमानदारी सबसे बड़ा गुनाह है रिश्तेदारी में। जो उधार माँगकर भूल जाए वो भला आदमी, जो याद दिला दे वो बुरा। जो सच दिखा दे वो दुश्मन, जो पर्दा डाल दे वो अपना। नैतिकता का तकाज़ा है कि बड़ों के पैर छुओ, पर वही बड़े अगर गलत हों तो चुप रहो। ये कैसी नैतिकता है जो रीढ़ तोड़ दे।
कूटनीतिक रिश्ता घर में महाभारत रचाता है। सास बहू की राजनीति, ननद भौजाई का शीतयुद्ध, दो भाइयों के बीच विदेश नीति। यहाँ हर बातचीत एक समझौता है। मुस्कान एक हथियार है। तारीफ एक घूस है। नाराज़गी एक प्रतिबंध है। मायके और ससुराल दो देश हैं और औरत बेचारी राजदूत है जिसका वीज़ा हर दिन रद्द हो सकता है।
राजनीतिक रिश्ता वोट की तरह है। मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं। चुनाव तक मामा, चुनाव बाद कौन मामा। पार्टी बदलते ही रिश्तेदार बदल जाते हैं। विचारधारा अलग हुई तो खून का रिश्ता भी देशद्रोही लगता है। ट्विटर पर लड़ने वाले भाई असल में एक थाली में नहीं खाते।
मनोवैज्ञानिक रिश्ता सबसे बड़ा घायल है। हर कोई अटेंशन माँगता है, कोई अटेंशन देता नहीं। सब सुनाना चाहते हैं, सुनना कोई नहीं चाहता। बचपन की कमी पूरी करने के लिए हम साथी से माँ बाप वाला प्यार माँगते हैं। अपेक्षा का बोझ इतना है कि प्यार की कमर टूट गई। इनसिक्योरिटी की दीमक हर रिश्ते को खोखला कर रही है। फोन का पासवर्ड माँगना भरोसा नहीं है, डर है। लोकेशन शेयर करना केयर नहीं है, कंट्रोल है। हम साथ होकर भी अकेले हैं। भीड़ में भी तन्हा हैं।
वैज्ञानिक रिश्ता हार्मोन का खेल है। डोपामिन चढ़ा तो इश्क, सेरोटोनिन गिरा तो झगड़ा। ऑक्सिटोसिन बंधन बनाए, टेस्टोस्टेरोन बंधन तुड़वाए। हम रोबोट हो गए हैं। एल्गोरिदम तय करता है कि किससे बात करनी है। लेफ्ट स्वाइप रिश्ता खत्म, राइट स्वाइप रिश्ता शुरू। तीन दिन की चैट के बाद हम आत्मा के साथी बन जाते हैं, तीन मिनट की गलतफहमी पर ब्लॉक कर देते हैं।
असली नकली का फर्क अब धुंधला है। असली रिश्ता वो जो बिना कहे समझ जाए, नकली वो जो समझ कर भी अनजान बने। असली वो जो पीठ पीछे तारीफ करे, नकली वो जो मुँह पर तारीफ और पीठ पीछे छुरा। असली रिश्ते में हिसाब नहीं होता, नकली रिश्ता पूरा बहीखाता है। आजकल नकली रिश्तों की पैकेजिंग इतनी शानदार है कि असली सादगी बोरिंग लगती है। फिल्टर वाला चेहरा, फिल्टर वाली हँसी, फिल्टर वाला रिश्ता।
कड़वी हकीकत ये है कि रिश्ते अब निवेश हैं। भावना का रिटर्न चाहिए। समय लगाओ तो ब्याज सहित वसूलो। अगर घाटा हो तो रिश्ता बेच दो। तलाक अब असफलता नहीं, समझदारी है। ब्रेकअप अब दर्द नहीं, रील का कंटेंट है। हम रिश्ते निभाते नहीं, मैनेज करते हैं। दिल से नहीं, दिमाग से। अपनापन से नहीं, अनुबंध से।
तो क्या रिश्ते मर गए। नहीं। कच्ची कलियाँ अब भी फूटती हैं। किसी अस्पताल में अनजान का खून देने वाला, किसी स्टेशन पर भूखे को रोटी खिलाने वाला, आधी रात को दोस्त की कॉल उठाने वाला, बिना स्वार्थ के माँ की आँख का काजल ठीक करने वाला। ये रिश्ते अब भी ज़िंदा हैं। ये जमीनी हैं। ये बिना नाम के हैं। बिना दावे के हैं।
अंत में बस इतना। रिश्ता ताला है तो चाबी भरोसा है। हथौड़े सह लेगा, पर दूसरी चाबी नहीं। और अगर चाबी खो जाए तो ताला तोड़ने से बेहतर है नया ताला ही न लगाना। अकेले रहो पर खरे रहो। क्योंकि भीड़ में लुट जाना तन्हाई से ज्यादा तकलीफ देता है।












