
अभी अभी लौटा हूँ मैं तो शमशान से,
अछूता हो गया हूँ बिना स्नान के।
अब तो लगे लगाकर रो रहा हूँ,
अब तो मैं किसी अंजान से।
दहलीज पर भी पैर न रखने दिया,
जब से लौटा हूँ मैं तो शमशान से।
समझ में नहीं आ रहा है इस तरह का,
हमको इस दुनियाँ की रितिरिवाज।
कल तक जिस पर हम फर्क करते थे,
उसीके नाम पर स्नान करते हम आज।
अपने हाथों से अपनों को जलाया हूँ,
देखकर किसी परोसी को आंसू बहाया हूँ।
क्योंकि अपने न अब अपने रहे,
बस उसकी यादें अब यादों में रह गए।
चन्दे पासवान उर्फ अलबेला जी मधुबनी बिहार से,












