
आजकल गर्मियाँ बहुत बढ़ गई हैं,
शरीर में हर जगह खाज हो रही है,
इलाज डरमटोलोजिस्ट करता है,
सियासी खाज लाइलाज होता है।
हवाट्सऐप यूनिवर्सिटी की पढ़ाई
आजकल बिना पैसे के मिलती है,
अफ़वाहें और दुर्भावना की पोस्ट,
इधर से कापी, उधर पेस्ट होती है।
कहीं हिंदू तो कहीं हिंदुस्तान ख़तरे में,
कहीं इस्लाम तो कहीं ईमान ख़तरे में,
अंग्रेज चले गये, अंग्रेजियत छोड़ गये,
और लाल फ़ीताशाही अब भी मज़े में।
धर्म और मजहब बहुत बौखलाये हैं,
मज़ारों के अंदर शिव मंदिर छिपाये हैं,
कहीं रोटी सूखी कहीं वह भी नहीं है,
पर अकूत सम्पदा दुनिया में भरी है।
अपना अहंकार चोट न खाने पाये,
किसी का गला कटता है कट जाये,
श्रीराम का प्रेम, भाई भरत का त्याग,
सब भूले, मंथरा की मंत्रणा ही भाये।
विचारधारा का अब कोई मोल नहीं,
जिसके विचार भिन्न वह धर्म द्रोही,
जिसने विरोध किया वह देश द्रोही,
इसके लिये फैले हैं हर जगह टोही।
वेदना भारतभुवन की सम्वेदनहीन है,
प्रेम व अनुरागहीन भ्रातत्व विहीन है,
हिमालय से सिंधु तक ईर्ष्या द्वेष व्याप्त है,
आदित्य अर्चना, रामावतार दरकार है।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ












