
“काल स्वयं मुझसे डरा है
मैं काल से नहीं,
काले पानी का कालकूट पीकर
काल से कराल स्तंभों को झकझोर कर
मैं बार-बार लौट आया हूं और फिर भी मैं जीवित हूं
हारी मृत्यु है, मैं नहीं”
वीर सावरकर एक क्रांतिकारी,स्वतंत्रता सेनानी, दूरदर्शी नेता और समाज सुधारक थे। वीर सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के केंद्र लंदन में उसके विरुद्ध क्रांतिकारी आंदोलन संगठित किया। जिन्होंने सन् 1857 की लड़ाई को ‘भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम ‘बताते हुए 1907 में लगभग एक हजार पन्नों का
इतिहास लिखा।”हिंदुत्व”की विचारधारा को परिभाषित किया और ‘पतित पावन मंदिर ‘के माध्यम से छुआछूत, जातिवाद के खिलाफ संघर्ष कर हिंदू समाज को एकजुट करने में अहम योगदान दिया।
*क्रांतिकारी राष्ट्रवाद-उन्होंने लंदन में’इंडिया हाउस के माध्यम से सशस्त्र क्रांति का प्रचार किया और “अभिनव भारत सोसाइटी का गठन किया।
*हिंदुत्व की परिभाषा-उन्होंने 1923 में अपनी पुस्तक’हिंदुत्व में’हिंदू पहचान को संस्कृत और राष्ट्रीय पहचान के रूप में परिभाषित किया।
*सामाजिक सुधार-रत्नागिरी में रहने के दौरान उन्होंने छुआछूत और जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने” पतित पावन मंदिर “स्थापित किया।
*सैन्यीकरण का आह्वान -उन्होंने हिंदू युवाओं को सेवा में भर्ती होने और ‘हिंदू राष्ट्र’ के सैन्यीकरण के लिए प्रेरित किया।
“साहित्यिक योगदान- “काले पानी”(सेलुलर जेल) की यातनाओं के दौरान, उन्होंने बिना कागज कलम के, दीवारों पर कीलों से लिखकर अपनी महान रचनाएं रचनाएं लिखीं।
*1857 का पुनर्मूल्यांकन-उन्होंने 1857 का स्वातंत्र्य समर नमक पुस्तक लिखकर ब्रिटिश नैरेटिव को
तोड़ा और भारतीयों में देशभक्ति की अलग जगाई।
अपनी अभिजात देशभक्ति से वीर सावरकर बस एक नाम भर नहीं रहा, राष्ट्रपति का एक मंत्र का ,एक विचार बन गया है। भारत की अखंडता के प्रबल पक्षधर, अद्वितीय स्वतंत्रता सेनानी स्वतंत्रयवीर सावरकर का महामंत्र था”एक राष्ट्र एक संस्कृति भाव”भारत की स्वतंत्रता के लिए उनका संघर्ष व राष्ट्र प्रेम हर भारतवासी के लिए प्रेरणा स्रोत है।
उन्होंने जाति -भेद और छुआछूत के खिलाफ लड़ाई लड़ी और दलितों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
वीर विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को ब्रिटिश भारत की मुंबई प्रेसिडेंसी के नासिक जिले के भागुर गांव में एक मराठी, हिंदू चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। नासिक जिला, जिसे अब नासिक जिले के नाम से जाना जाता है, वर्तमान भारतीय राज्य महाराष्ट्र में स्थित है। उनके माता-पिता दामोदर और राधाबाई सावरकर थे।
वीर सावरकर की रचनाएं बहुत विविध और गहरी हैं। उनकी कुछ प्रमुख रचनाएं हैं:-
*मेरा आजीवन कारावास
*1897 का समर
*काला पानी
*जीवन संघर्ष
*हिंदुत्व
*गामतेर
*प्रतिशोद
*पंच प्राण
नाटक -अंधा युग, उपन्यास -गुनाहों का देवता, सूरज का सातवां घोड़ा आदि
“द इंडियन वार आंन इंडिपेंडेंस”
उनके द्वारा लिखी गई एक प्रसिद्ध पुस्तक है। यह पुस्तक 1857 के भारतीय विद्रोह के विषय में थी। यह पहली बार 1909 में प्रकाशित हुई थी। इस ब्रिटिश अधिकारियों ने प्रतिबंधित कर दिया था।
उनकी जुबानी —
“महान लक्ष्य के लिए किया
गया कोई भी बलिदान
व्यर्थ नहीं जाता है”
वीर सावरकर का निधन 26 फरवरी 1966 को मुंबई में हुआ था। उनकी विरासत आज भी भारतीय राजनीति और समाज में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
उन्हीं की अभिव्यक्ति –
“यह तीर्थ महातीर्थों का है, मत कहो इसे काला पानी, तुम सुनो यहां की धरती के कण- कण से गाथा बलिदानी”
वह एक प्रखर राष्ट्रवादी थे, जिन्होंने भारत की अखंडता पर हमेशा जोर दिया। ऐसे महान राष्ट्रभक्ति के चरणों में कोटि-कोटि नमन!!
डॉ मीना कुमारी परिहार












