
ऐ जिंदगी, क्यों करती बिखरे- बिखरे से इशारे
लब से कुछ बोलती क्यों नहीं
हम तुझसे ही हारे
यह दुनियां बड़े-बड़े दावे से नहीं चलती
गर कुछ करना है तो हौसला दो
यूं बिखरे- बिखरे से इशारे मत करो
ऐ जिंदगी पढ़ लिया करो कुछ अनकहे अल्फाजों को, समझ लिया करो
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे बिखरे -बिखरे इशारे को कौन समझेगा..?
तुम तो बस हर बात को बिखरे -बिखरे इशारों से कह जाते हो
तुम क्यों नहीं समझते..?
कभी आंसू में,कभी हंसी में, तो कभी खामोशी में
ये रिश्ते इन्हीं से चलते हैं
कुछ कहते क्यों नहीं तुम
हर वो बात को बिखरे -बिखरे से इशारों में निपटाना चाहते हो
तुम्हें तो हमेशा जल्दी होती है
तुम्हारे इशारे से काम नहीं चलता है
डॉ मीना कुमारी परिहार












