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आओ चलें नानी के घर।आओ चलें नानी के घरनेह का पलना बांटे खुशियां झोली भर

डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर,ट्रेनर,सामाजिक कार्यकर्ता है।

गर्मी की छुट्टी आयी।समय आया है नानी के घर जाने का,मन में बड़ी उम्मीद उमंग है
आओ चलें नानी के घर। नाम सुनते ही मुँह में घी-शक्कर घुल जाता है। वो घर जहाँ दरवाजे पर ताला नहीं, भरोसा लटका होता है। जहाँ तुलसी का पौधा आज भी बिना खाद के हरा है, क्योंकि उसमें हमारे बचपन की हँसी का पानी पड़ता है। वहाँ नेह का पलना अब भी टँगा है। पहले उसकी रस्सी सुतली की थी, अब नायलॉन की है। मजबूत तो हो गई, पर हाथ में चुभती है। हम झोली भर खुशियाँ बाँटने निकले थे, पर रास्ते में ही जेब टटोलने लगते हैं। बस का किराया है या नहीं। यही आज का पहला सच है। कड़वा है, पर सच है।

पहले नानी का आँगन पूरा गाँव था। वहीं फसल का भाव तय होता था। वहीं रिश्ते जुड़ते थे। वहीं लड़ाई में बड़े-बूढ़े बीच-बचाव करते थे। उस आँगन में नैतिकता रहती थी। अब आँगन पक्का हो गया। सीमेंट का। उसमें वाई-फाई के सिग्नल पूरे आते हैं, पर ओस की बूँद नहीं गिरती। नानी अब भी सुबह चार बजे उठती है। दिया-बाती करती है। भगवान को भोग लगाती है। हम उसी समय अलार्म की स्नूज़ दबाते हैं। कहते हैं नींद पूरी नहीं हुई। तनाव है। डिप्रेशन है। दोनों अपनी जगह सही हैं। पर बीच में जो बातचीत का पुल था, वो टूट गया। नानी की आँख का पानी और हमारे कोल्ड ड्रिंक का रंग एक जैसा लगता है। पर एक में ममता है, दूसरे में सिर्फ गैस। ये फर्क खट्टा है।

हमारे रिश्ते अब गमले के फूल जैसे हो गए। दिखते सुंदर हैं। पर खुशबू नहीं आती। जड़ नहीं है। व्हाट्सएप खोलो तो रोज़ सुबह गुड मॉर्निंग का गुलाब मिल जाएगा। पर महीने में एक बार भी नानी की आवाज़ सुनने का समय नहीं मिलता। हमने प्यार को भी किश्तों में बाँट दिया। ईएमआई बना दिया। पहले बेटी जब ससुराल जाती थी तो नानी उसे छाती से लगाकर खूब रोती थी। आँचल गीला हो जाता था। आज हम वीडियो कॉल करते हैं। स्क्रीनशॉट लेते हैं। स्टेटस लगाते हैं। मिस यू नानी। भाव वही है, पर तरीका बदल गया। असली आँसू और मोबाइल के स्टिकर में जो फर्क है, वही आज का घाटा है। पैसों का नहीं, भावनाओं का।

दुनिया कहती है आगे बढ़ो। पैसा कमाओ। नाम कमाओ। शास्त्र कहते हैं कि जो किया है वो भरना पड़ेगा। हम दोनों के बीच में लटक गए। नानी कहती थी कि तुलसी में जल चढ़ाओ। पितर खुश रहते हैं। हम कहते हैं कि आरओ का पानी वेस्ट मत करो। विज्ञान अपनी जगह ठीक है। पर वेदों में पानी को देवता इसलिए कहा गया कि हम उसकी कदर करें। हमने कदर नहीं की। हमने बिल गिना। अब हर बूँद पर टैक्स है। और हर रिश्ते पर भी एक अनदेखा बिल लटक रहा है। समय दो, तभी समय मिलेगा। नहीं तो रिश्ता एक्सपायर हो जाएगा।

चुनाव आता है तो नेता नानी के घर पहुँच जाता है। बूढ़ी आँखें, झुकी कमर, पेंशन की लाइन। फोटो खिंचती है। अखबार में छपती है। गोद में बैठी नातिन पूछती है कि ये कौन अंकल हैं। नानी हँसकर कहती है कि बेटा ये मौसम हैं। आते हैं, चले जाते हैं। इतनी बड़ी बात हम बड़ी-बड़ी डिबेट में नहीं सीख पाते। वहाँ तो बस शोर है। नानी के एक वाक्य में पूरी राजनीति धरी है।

पहले मोहल्ले की काकी खबर लाती थी। किसके घर बेटा हुआ, किसकी तबीयत खराब है। अब फोन पर नोटिफिकेशन आता है। रिश्ते भी अब कुरकुरे जैसे हो गए। पैकेट खोलो, खाओ, खत्म। न स्वाद रुकता है न बात। नानी के घर अचार की बरनी थी। सालों-साल चलती थी। खट्टी भी, मीठी भी। यादों की तरह। अब हमारे रिश्ते दो महीने में खराब हो जाते हैं। जैसे प्रिज़र्वेटिव खत्म हो गया हो। वजह बस इतनी कि हमने सहना बंद कर दिया। जरा सी मिर्च लगी, और हमने ब्लॉक कर दिया। अनफ्रेंड कर दिया।

पहले घर का पंडित पंचांग देखकर शुभ दिन बताता था। अब मोबाइल में ऐप है। एस्ट्रो टॉक। नानी अब भी मानती है कि पहली रोटी गाय की निकलनी चाहिए। हम कहते हैं कि पहले प्रोटीन शेक पीना है। जिम जाना है। दोनों ठीक हैं। पर साथ बैठकर खाने का रिवाज खत्म हो गया। थाली अलग हो गई। स्क्रीन अलग हो गई। एक ही छत के नीचे हम सब अजनबी हो गए। ये दूरी सबसे ज्यादा चुभती है।

साइंस कहता है कि जब हम अपनों से मिलते हैं तो दिमाग में ऑक्सीटोसिन निकलता है। खुशी का हार्मोन। नानी कहती है कि ये तो मेरा आशीर्वाद है बेटा। बात एक ही है। बस कहने का तरीका अलग है। हमने भाषा के झगड़े में भाव खो दिया। नकली घी के डिब्बे पर बड़ा-बड़ा शुद्ध लिखा होता है। और शुद्ध रिश्तों पर हम शक करने लगे हैं। यही सबसे बड़ा नुकसान है।

आजकल तो नेह का पलना भी बिकने लगा है। ओएलएक्स पर डाल दो। लोग पूछते हैं कि गारंटी कितने दिन की है। पुराना है तो दाम कम लगाओ। नानी सुनती है और कहती है कि बेटा गारंटी तो भगवान की भी नहीं होती। मैं क्या दूँ। ये जवाब सुनकर हम चुप हो जाते हैं। क्योंकि हमारी बैलेंस शीट में आशीर्वाद का कोई खाना नहीं होता।

तो अब क्या करें? नवाचार का मतलब नया फोन नहीं है। नवाचार ये है कि हफ्ते में एक दिन तय करो। उस दिन फोन को साइलेंट पर डाल दो। नानी के पास जाकर बैठो। कुछ मत बोलो। बस बैठो। उनके झुर्रियों वाले हाथ अपने हाथ में लो। उन लकीरों में पूरी रामायण लिखी है। अचार की बरनी खोलो। उंगली डुबोकर चाटो। वो खट्टा स्वाद जो आँखें बंद करवा दे, वही असली है। वही क्रिस्पी मोमेंट है।

रिश्तों की कलियाँ मत तोड़ो दोस्त। उन्हें पानी दो। खाद दो। धूप दिखाओ। तोड़ने में एक सेकंड लगता है। जोड़ने में पूरी जिंदगी लग जाती है। और कई बार जिंदगी भी कम पड़ जाती है।

इसलिए आज ही उठो। कैलेंडर देखो। टिकट बुक करो। बस, ट्रेन, कुछ भी पकड़ो। नानी के दरवाजे पर जाकर कुंडी खटखटाओ। जोर से बोलो कि नानी मैं आ गया। वो दौड़कर आएगी नहीं। धीरे-धीरे आएगी। दरवाजा खोलेगी। तुम्हें देखेगी। और पहला वाक्य यही होगा कि आ गया मेरा लाल, भूखा होगा। बस। इतने में दुनिया भर की फिलॉसफी खत्म। साइकोलॉजी खत्म। इकोनॉमिक्स खत्म। बचेगा तो सिर्फ सुकून।

जिंदगी नानी की रसोई जैसी है। वहाँ धुआँ भी है। गर्मी भी है। कभी सब्जी जल भी जाती है। पर जो रोटी वहाँ सिकती है, उसका स्वाद किसी फाइव स्टार में नहीं मिलता। क्योंकि उसमें ममता का नमक है।

तो इस बार झोली भरने मत जाना। झोली खाली करने जाना। अपना समय दे आना। दो मीठे बोल दे आना। पाँव दबा देना। उनकी कहानी सुन आना। क्योंकि जिस दिन नानी का घर बंद हो गया, उस दिन समझ लेना कि दुनिया से अपनापन उठ गया। फिर न कुछ तीखा बचेगा न मीठा। सब फीका।

इसलिए दोस्त, अभी इसी वक्त फोन उठाओ। नंबर मिलाओ। बोलो कि नानी अगले संडे आ रहा हूँ। पक्का। कल किसने देखा है। जो आज है, वही अपना है। चलें?
तो चलो नानी के घर जहाँ चलो कर लो तैयारी हम तो चले नानी के घर।
खुशियों के लगा आसमानी पर

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