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मन की व्यथा

घर में अपने ग़म को लेकर यूं न जाइए
सुनहरे सपनों को जरा फिर से सजाइए

बैरी तो मिलते रहेंगे थोक भाव में
सज्जनों से मिलकर खूब मुस्कुराइए

अश्कों से जो आई नमी शीतलता दे गई
ये तो मन की व्यथा है आंखों पे न जाइए

रंज रहे, तंज कसे पामरों ने हैं जाल रचे
इत्मीनान से तो आप निकल ही जाइए

माना की अमावस की रात है अंधेरी घनी
जुगनुओं को साथ लेकर जगमगाईए

न मिले चांद और सुरज तो क्या हुआ
टूटे हुए तारों को जोड़ खिलखिलाइये

रुक गए राही क्यों पथ में काटें देखकर
पाना है खुशी के पुष्प तो कदम बढ़ाइए

“”रवि भूषण वर्मा””

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