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दो जून की रोटी

घर को छोड़कर जाना पड़ता है कमाने के लिए,
गरीब बधुआ मजदूर लगता है जमाने के लिए।
खून पसीना एक कर देता है गरीब इंसान अपना,
दिन रात मेहनत करता दो जून के खाने के लिए।।

मजदूर अपने जीवन में कभी विराम नहीं करता है,
मेहनत करता रहता है कभी आराम नहीं करता है।
फिर भी गरीब को भरपूर मजदूरी नहीं मिल पाती है,
मजदूर दो जून की रोटी के लिए मेहनत करता है।।

देश का किसान ही देश का भरण पोषण करता है,
किसान ही किसानी करके अमीरों का पेट भरता है।
फिर भी दिन-रात तड़पता रहता है गरीब हमेशा ही,
बताओ आजकल भला गरीबों का सुध कौन करता है।।

धरती का सीना चीर कर फसल उगाता है किसान,
गरीबी है पर अपना आत्मसम्मान बचाता है किसान।
किसान के मन में कोई जलन,ईर्ष्या भाव नहीं होता है,
मेहनत करके फसल से देश को लहलहाता है किसान।।


प्रभात सनातनी “राज” गोंडवी
गोंडा-उत्तर प्रदेश

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